ग्लाइसेमिक इंडेक्स क्या है, काम का है?
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ग्लाइसेमिक इंडेक्स एक पैमाना है जो बताता है कि कार्बोहाइड्रेट ढोने वाला कोई खाना खाने के बाद की बढ़त कितनी तेज़ी से बनाता है। कार्बोहाइड्रेट की तय मात्रा वाले हिस्सों की तुलना एक संदर्भ खाने से की जाती है। इसका काम का पहलू और इसकी सीमा एक ही जगह पर हैं: प्रयोगशाला की हालत असली थाली जैसी नहीं होती।
विचार सीधा है। एक ही मात्रा में कार्बोहाइड्रेट ढोने वाले दो खाने पाचन में एक ही रफ़्तार से आगे नहीं बढ़ते। सफ़ेद रोटी मुँह में और आँत में जल्दी टूटती है; छिलके वाली दाल वही रास्ता कहीं भारी क़दमों से तय करती है। ग्लाइसेमिक इंडेक्स इस रफ़्तार के फ़र्क़ को एक ही क़तार में बदलने की कोशिश है।
माप प्रयोगशाला में शुरू होता है। स्वयंसेवक एक ऐसा हिस्सा खाते हैं जिसमें पचने वाले कार्बोहाइड्रेट की मात्रा स्थिर रखी गई हो; अगले दो घंटे तक तय अंतराल पर खून के नमूने जमा होते रहते हैं। वही व्यक्ति किसी और दिन संदर्भ खाना लेता है, ज़्यादातर शुद्ध ग्लूकोज़ या सफ़ेद रोटी। दोनों वक्रों के नीचे बचे क्षेत्रफल आपस में अनुपात में रखे जाएँ तो उस खाने को एक क्रम-संख्या मिल जाती है। क़तार तीन ढेरों में बँटती है: कम, मध्यम, ऊँचा।
क्रम-संख्या अकेले थाली नहीं बताती। ग्लाइसेमिक लोड उसी क़तार में एक और चीज़ जोड़ देता है, यानी हिस्से का आकार; वह खाने के इंडेक्स को उस हिस्से में मौजूद कार्बोहाइड्रेट की मात्रा के साथ हिसाब में लेता है। तरबूज़ अच्छा उदाहरण है। वह क़तार में ऊपर की तरफ़ खड़ा रहता है, पर तरबूज़ की एक फाँक जितना कार्बोहाइड्रेट ढोती है वह छोटा रह जाता है। इंडेक्स ऊँचा, लोड कम।
| पैमाना | ग्लाइसेमिक इंडेक्स | ग्लाइसेमिक लोड |
|---|---|---|
| वह क्या बताता है | बढ़त की रफ़्तार | रफ़्तार और मात्रा दोनों साथ |
| वह किसे देखता है | खाने की क़िस्म और बनावट | क़िस्म और थाली में रखे हिस्से को |
| क्या हिस्सा जोड़ता है | नहीं जोड़ता | जोड़ता है |
| तरबूज़ का उदाहरण | क़तार में ऊपर | एक फाँक में छोटा |
क़तार को हिला देने वाली चीज़ें चूल्हे पर, फ़्रिज में और थाली में शुरू होती हैं। वही खाना, हाथ से गुज़रते-गुज़रते माप की मेज़ वाली अपनी हालत से दूर चला जाता है।
- पकाना: देर तक पका पास्ता और अधपका रह गया पास्ता एक ही जगह नहीं खड़े होते।
- पकने की हालत: हरा-सा केला और चित्तीदार केला अलग बर्ताव करते हैं।
- पिसाई: वही अनाज बारीक आटा बन जाए तो किसी और खाने जैसा बर्ताव करता है।
- साथ वाले: वही कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन के साथ आए तो धीमे आगे बढ़ता है।
- व्यक्ति का अपना फ़र्क़: वही रोटी, उसी व्यक्ति में भी दिन-ब-दिन एक जैसा जवाब नहीं देती।
यह आख़िरी बात नापी हुई है। साठ से ज़्यादा स्वस्थ स्वयंसेवकों के साथ दोहराए गए एक अध्ययन में, उसी सफ़ेद रोटी का इंडेक्स मान उसी व्यक्ति में दिन-ब-दिन क़रीब पाँचवें हिस्से जितना हिला; और लोगों के बीच का फ़र्क़ उससे भी चौड़ा था। यानी सूची में जो चीज़ अकेले एक अंक जैसी दिखती है, असल में एक चौड़ी पट्टी है।
फिर भी इस पैमाने का एक सच्चा इस्तेमाल है। एक ही परिवार के दो खानों की तुलना करते समय यह मोटा-मोटा ख़याल दे देता है: साबुत दाने वाला अनाज और उसी अनाज के आटे से बना उत्पाद इसी पैमाने पर अलग होते हैं। आटा बन चुके साबुत गेहूँ और सफ़ेद आटे के बीच का फ़र्क़ उतना बड़ा नहीं जितना समझा जाता है। फ़र्क़ करने वाली चीज़ साबुत अनाज का लेबल नहीं, दाने का पिसा होना या न होना है। आज के नैदानिक मार्गदर्शक इंडेक्स को कार्बोहाइड्रेट की गुणवत्ता का सिर्फ़ एक चेहरा मानते हैं, अकेला फ़ैसला करने का औज़ार नहीं।
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