मधुमेह में प्यास और वज़न घटना क्यों?
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मधुमेह में शक्कर का एक हिस्सा खून में जमा होता है, गुर्दे से पेशाब में जाता है और जाते-जाते पानी को भी घसीट ले जाता है। शरीर वह पानी वापस माँगता है, इसलिए प्यास नहीं बुझती। उसी वक़्त कोशिकाएँ शक्कर भीतर नहीं ले पातीं; शरीर वसा और माँसपेशी के भंडार को ईंधन बना लेता है।
गुर्दा खून से गुज़रने वाली शक्कर वापस सोख लेता है। पर सोखने की यह क्षमता असीमित नहीं है। शक्कर की ऊँचाई उस सीमा से ऊपर बनी रहे तो नेफ़्रॉन के ग्लूकोज़ वाहक भर जाते हैं और बची शक्कर पेशाब में रिस जाती है। शक्कर जाते समय पानी को भी साथ खींचती है। इसका नाम ऑस्मोटिक ड्यूरेसिस है। पॉलीयूरिया इसी घसीटन से पैदा होता है: पेशाब बार-बार भी आता है और मात्रा में भी बड़ा होता है।
खोया हुआ द्रव खून को गाढ़ा कर देता है। हाइपोथैलेमस के ऑस्मोरिसेप्टर इस गाढ़ेपन को पढ़ते हैं और प्यास का अलार्म खोल देते हैं। मुँह सूखता है, जीभ तालू से चिपकती है। रात की नींद पानी और शौचालय के बीच बँट जाती है। पिया हुआ पानी पेशाब से निकलता रहता है, इसलिए पॉलीडिप्सिया बंद नहीं होता। गिलास ख़ाली होता है, प्यास अपनी जगह रहती है। जाने वाला सिर्फ़ पानी भी नहीं है; सोडियम और पोटैशियम उसी बहाव में मिल जाते हैं और माँसपेशी की ताक़त इस नुक़सान का हिस्सा उठाती है।
| जो महसूस होता है | उसके पीछे का तंत्र |
|---|---|
| बार-बार पेशाब | पेशाब की शक्कर पानी को साथ घसीट रही है |
| न बुझने वाली प्यास | खोया हुआ द्रव खून को गाढ़ा कर रहा है |
| वज़न घटना | पेशाब से कैलोरी जा रही है, भंडार भी गल रहे हैं |
वज़न घटने की दो नालियाँ हैं। पहली पेशाब है। खाई गई रोटी, दूध और फल का कार्बोहाइड्रेट खून में ग्लूकोज़ बनकर जाता है; इस ग्लूकोज़ का एक हिस्सा बिना इस्तेमाल हुए पेशाब में मिल जाता है। जो व्यक्ति मेज़ से पेट भरकर उठता है, वह भी ऊर्जा का हिस्सा शौचालय में छोड़ आता है।
दूसरी नाली इंसुलिन की तरफ़ है। इंसुलिन कम हो या इंसुलिन प्रतिरोध संकेत कमज़ोर कर रहा हो तो कोशिका दरवाज़े पर खड़े ग्लूकोज़ को भीतर नहीं ले पाती। शरीर उस समय ऐसे बर्ताव करता है जैसे भूखा हो: वसा ऊतक को खोलता है और यकृत नया ईंधन बनाता है। इंसुलिन की कमी में ग्लूकागन बेजोड़ रह जाता है; माँसपेशी से खुलने वाले अमीनो अम्ल यकृत जाते हैं और वहाँ नया ग्लूकोज़ बन जाते हैं। माँसपेशी का प्रोटीन संतुलन यों घाटे में चला जाता है और नया प्रोटीन बनना पीछे रह जाता है। वज़न थाली से नहीं, भंडार से उतरता है।
लगातार लगने वाली भूख भी इसी तस्वीर का हिस्सा है। ब्लड शुगर ऊँचा हो तब भी कोशिका के भीतर ईंधन नहीं होता, और दिमाग़ इस ख़ालीपन को भूख के रूप में पढ़ता है। नाश्ते के बाद भी कुछ चबाने की इच्छा लौट आती है। थकान इसी जड़ से बँधी है: घटता द्रव, गला हुआ माँसपेशी ऊतक और भीतर न जा पाने वाली ऊर्जा। काम के दिन के बीचोंबीच सुस्ती इसीलिए भारी पड़ती है।
यही तंत्र हर मधुमेह में एक ही रफ़्तार से आँखों में नहीं खटकता। निशान किस क्रम में उभरते हैं और कौन-सा मेल उसी दिन आकलन माँगता है, यह मधुमेह के पहले लक्षणों वाला अलग लेख एक-एक करके गिनाता है।
इलाज शुरू होने के बाद ग्लूकोज़ लक्ष्य दायरे के पास आ जाए तो गुर्दा शक्कर को पेशाब में देना बंद कर देता है। ऑस्मोटिक ड्यूरेसिस रुकता है, द्रव का संतुलन बैठता है, रात के उठने विरल हो जाते हैं। प्यास और वज़न घटने का साथ-साथ चलना इसी से आता है कि दोनों को एक ही तंत्र बनाता है।
स्रोत
- American Diabetes Association Professional Practice Committee. 2. Diagnosis and Classification of Diabetes: Standards of Care in Diabetes—2026. Diabetes Care. 2026;49(Suppl 1):S27–S49. doi:10.2337/dc26-S002
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- James H, Gonsalves WI, Manjunatha S, et al. The Effect of Glucagon on Protein Catabolism During Insulin Deficiency: Exchange of Amino Acids Across Skeletal Muscle and the Splanchnic Bed. Diabetes. 2022;71(8):1636–1648. doi:10.2337/db22-0079