दवाएँ और इंसुलिन
इंसुलिन से इलाज
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इंसुलिन शुरू करना क्या हार है?इंसुलिन पर जाने का सुझाव ज़्यादातर लोगों में हार का एहसास जगाता है, और यही एहसास फ़ैसले को महीनों टाल देता है। जबकि यह क़दम कोई सज़ा नहीं; यह उस रोग की बरसों में आगे बढ़ने वाली क़ुदरती चाल का एक पड़ाव है। इस हिचक का साहित्य में एक नाम है; फ़ैसले को क्या आसान करता है, यह भी नापा जा चुका है। · 2 मिनटआगे पढ़ें
इंसुलिन का सुझाव कान को किसी परीक्षा के नतीजे जैसा लगता है, और व्यक्ति उसी पल अपना बीता हुआ खंगालने लगता है: छूटी हुई सैर, भारी होती मेज़ें, बीच-बीच में देर से हुई जाँचें। शोधकर्ता इस प्रतिक्रिया को तीस बरस से पहचानते हैं। उन्होंने इसे मनोवैज्ञानिक इंसुलिन प्रतिरोध नाम दिया। नाम में प्रतिरोध है। पर इसका ज़िद से नाता नहीं। असली मामला वे विश्वास हैं जो व्यक्ति बरसों से इंसुलिन के बारे में ढो रहा है।
इन विश्वासों के सामने खड़ी सचाई एक वाक्य में समा जाती है: बाहर से इंसुलिन की ज़रूरत पड़ना व्यक्ति की कोशिश से नहीं, बरसों में घटती बनाने की क्षमता से जुड़ा है। क्षमता क्यों सिकुड़ती है और इलाज समय के साथ क्यों बदलता है, इस पर एक अलग लेख है। टाइप 1 मधुमेह में तो तस्वीर शुरू से ही अलग है; वहाँ इंसुलिन पहले दिन से जीवन के लिए ज़रूरी है।
देर कराने वाले विचार कुछ शीर्षकों में जमा होते हैं और इन सबके पीछे एक जैसी ग़लतफ़हमी खड़ी है।
- “सुई बहुत दर्द देती है।” अपेक्षित दर्द और भोगे गए दर्द का फ़र्क़ इस क्षेत्र के अध्ययनों का सबसे बार-बार दोहराया जाने वाला नतीजा है। पेन की नोकें बहुत पतली हैं और चमड़ी में जाने वाला हिस्सा छोटा।
- “मतलब हालत बिगड़ गई।” इंसुलिन बिगड़ने का पैमाना नहीं है। रोग किस चरण में है, यह इस्तेमाल की जा रही दवा से पीछे की ओर नहीं पढ़ा जाता।
- “अब वापसी नहीं है।” कुछ लोगों में इंसुलिन सिर्फ़ एक दौर तक चलती है। यह हमेशा उम्र भर के लिए नहीं भी हो सकती, यह सुनना एक अध्ययन में हिस्सा लेने वालों के तीन-चौथाई से ज़्यादा को अच्छा लगा।
- “सबको पता चल जाएगा।” दिख जाने की चिंता अकसर ज़ुबान पर आती है; मेहमान हों तो यह भाव और बड़ा हो जाता है। जबकि लगाना एक छोटे से उपकरण से और बहुत कम समय में ख़त्म हो जाता है।
इस हिचक की क़ीमत एक ख़ामोश इंतज़ार बन जाती है। एक समीक्षा में बताया गया कि इंसुलिन पर जाने से पहले के तीन से पाँच बरसों तक आधे से ज़्यादा लोग लक्ष्य से ऊपर बने रहे। फ़ैसला अकसर जान-बूझकर टालना भी नहीं होता; बात हर जाँच पर अगली बार के लिए रह जाती है और बरस अपने आप बीतते जाते हैं।
असल में क्या मदद करता है, यह शोध ने नापा। एक अध्ययन में सबसे ज़्यादा काम आने वाला तरीक़ा यह निकला: पूरा सिलसिला शुरू से आख़िर तक समझा दिया जाए। उसके ठीक बाद यह आराम आता है कि मन में कुछ अटके तो टीम तक पहुँचा जा सके। सबसे कम काम आने वाला रास्ता ज़िद है। वह उलटा असर करती है। बार-बार मनाने की कोशिश ने हिस्सा लेने वालों में से आधे से ज़्यादा को छुआ ही नहीं।
अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देश इस मोड़ पर असामान्य रूप से साफ़ चेतावनी ढोते हैं। वे चिकित्सकों से कहते हैं कि इंसुलिन को किसी धमकी की तरह या किसी निजी हार के निशान की तरह न बताया जाए। क्योंकि यह कोई नंबर नहीं है। यह एक पड़ाव है। उसका समय और उसका रूप व्यक्ति दर व्यक्ति बदलता है, और इसे बात करने की जगह भी जाँच के दौरान होने वाली उसी छोटी मुलाक़ात के भीतर है।
इंसुलिन की क़िस्में कौन-सी हैं?इंसुलिन की क़िस्मों को एक-दूसरे से अलग करने वाली चीज़ वह वक्र है जो असर शरीर में समय के साथ खींचता है। असर कब शुरू हुआ, अपने सबसे ताक़तवर बिंदु पर कब पहुँचा और कितनी देर चला — ये तीनों तय करते हैं कि कोई इंसुलिन किस परिवार में आती है। इन तीन पैमानों को जाने बिना की गई तुलना हवा में रह जाती है। · 2 मिनटआगे पढ़ें
इंसुलिनों को अलग करने वाली शक्ल तीन पैमाने बताते हैं: असर कितनी जल्दी शुरू होता है, सबसे ताक़तवर पल कितना साफ़ है, और कुल मिलाकर वह कितने चौड़े समय पर फैलता है। तीनों मिलकर एक वक्र बना देते हैं। दो अलग परिवारों के वक्र एक-दूसरे से बहुत दूर गिरते हैं; फ़र्क़ भी यहीं से पैदा होता है।
फ़र्क़ की जड़ अणु ख़ुद है। इंसुलिन शीशी में अकेली नहीं ठहरती, वह ज़िंक के चारों ओर छह-छह के गुच्छों में जमा हो जाती है। चमड़ी के नीचे जाने के बाद खून में मिल पाने के लिए इस गुच्छे का पहले एक-एक अणु में खुलना ज़रूरी है। खुलना जितना जल्दी होता है, असर उतना जल्दी शुरू होता है। तेज़ असर वाले एनालॉग में अणु के कुछ निर्माण-खंड बदले हुए हैं, इसीलिए गुच्छा ज़्यादा ढीला रहता है और जल्दी बिखर जाता है।
लंबे असर वाली इंसुलिनों में मक़सद इसका उलटा है। कुछ शीशी में साफ़ रहती हैं पर चमड़ी के नीचे जाते ही एक पतला जमाव छोड़ देती हैं और वहीं से थोड़ा-थोड़ा घुलती हैं। कुछ खून के वाहक प्रोटीन से चिपककर दौरे में देर लगाती हैं। मध्यम असर वाली इंसुलिन में प्रोटामिन नाम का एक प्रोटीन यही धीमा करने का काम करता है। नतीजे में एक ऐसा वक्र सामने आता है जिसकी चोटी चपटी है और जो लंबा तथा नीचा है।
परिवारों को अगल-बगल रखना तस्वीर साफ़ कर देता है।
| परिवार | असर शुरू होना | चोटी | फैलने का समय | निभाई भूमिका |
|---|---|---|---|---|
| तेज़ असर वाला एनालॉग | बहुत जल्दी | साफ़ और जल्दी | तंग | भोजन की इंसुलिन |
| छोटे असर वाली मानव इंसुलिन | देर से | साफ़, कुछ बाद में | मध्यम | भोजन की इंसुलिन |
| मध्यम असर, प्रोटामिन वाली | धीमे | चौड़ी और बीच में | आधे दिन से ऊपर | बुनियादी इंसुलिन |
| लंबे असर वाला एनालॉग | धीमे | लगभग सपाट | पूरे दिन पर फैला | बुनियादी इंसुलिन |
| मिश्रण | दो वक्र एक पर एक | एक जल्दी वाली चोटी | चौड़ा | दोनों एक साथ |
तालिका के पाँच परिवार चमड़ी के नीचे दिए जाने वाले रूपों को समेटते हैं। फेफड़े में खींचा जाने वाला चूर्ण रूप इन्हीं पैमानों से नहीं पढ़ा जाता; उसका रास्ता चमड़ी से नहीं, फेफड़े से होकर जाता है।
तालिका की भूमिकाएँ दो शीर्षकों में जमा होती हैं: बुनियादी इंसुलिन और भोजन की इंसुलिन। असली सवाल यह है: ये दोनों भूमिकाएँ एक ही वक्र से क्यों नहीं निभाई जा सकतीं? शरीर का अपना स्राव भी दो परतों वाला है। एक नीची पृष्ठभूमि दिन भर चलती है और नींद में भी नहीं रुकती; और खाने के बाद तेज़ी से चढ़कर उतरने वाली एक लहर आती है। अलग-अलग रफ़्तार वाली इंसुलिनें इन्हीं दो परतों की अलग-अलग नक़ल करने के लिए हैं।
परिवार का नाम फिर भी एक मोटा वर्ग है। लंबे असर वाले कुछ एनालॉग लगभग एक सीधी रेखा बना लेते हैं और कुछ इतने चौड़े क्षेत्र पर फैलते हैं कि एक दिन आराम से पार कर जाएँ। तेज़ असर वालों के बीच भी रफ़्तार के छोटे फ़र्क़ हैं। एक ही पंक्ति में लिखे गए दो उत्पाद हूबहू एक-दूसरे पर नहीं बैठते।
दिखावट भी एक मोटा सुराग़ देती है। पेन या शीशी के भीतर का तरल मध्यम असर वाली इंसुलिनों में और ज़्यादातर मिश्रणों में धुँधला होता है; तेज़ और लंबे असर वालों में ज़्यादातर साफ़। फिर भी वही उत्पाद हर किसी में वही वक्र नहीं खींचता। सोखे जाने की रफ़्तार व्यक्ति दर व्यक्ति साफ़ तौर पर बदलती है, और यह फ़र्क़ मानव इंसुलिन में सबसे ज़्यादा आँख में आता है।
इंसुलिन गोली के रूप में क्यों नहीं?इंसुलिन एक प्रोटीन है और पाचन तंत्र ठीक प्रोटीन तोड़ने के लिए ही चलने वाली व्यवस्था है। मुँह से जाने वाली इंसुलिन खून तक पहुँचने से पहले पेट के अम्ल और आँत के एंज़ाइम से टकराती है। और जो थोड़ा हिस्सा बिना टूटे बच जाए, उसके लिए आँत की दीवार बहुत कसी हुई रुकावट है। · 2 मिनटआगे पढ़ें
कोई गोली, एक गिलास पानी के पीछे, पहले पेट में उतरती है। पेट प्रोटीन तोड़ने के लिए चलने वाला माहौल है और अम्ल प्रोटीन की ज़ंजीरों की मुड़ी हुई शक्ल खोल देता है। इंसुलिन का काम ठीक उसी मुड़ी शक्ल पर टिका है। शक्ल बिगड़ते ही अणु वहीं तो रहता है, पर अब कोई दरवाज़ा नहीं खोलता।
एंज़ाइम दूसरी चोट मारते हैं, क्योंकि पेट में पेप्सिन और छोटी आँत में ट्रिप्सिन तथा काइमोट्रिप्सिन जैसे एंज़ाइम ज़ंजीर को टुकड़ों में बाँट देते हैं। ये एंज़ाइम थाली के प्रोटीन और दवा के प्रोटीन में फ़र्क़ नहीं करते। उनके लिए इंसुलिन एक साधारण भोजन है।
तीसरी रुकावट आकार है। आँत की दीवार की कोशिकाओं के बीच के कसे हुए जोड़ सिर्फ़ बहुत छोटे अणुओं को रास्ता देते हैं, और इंसुलिन इसके लिए बहुत बड़ी है। ऊपर से एक श्लेष्मा की परत भी है। चौथी है यकृत: आँत से गुज़रने वाली हर चीज़ पहले वहीं जाती है, और यकृत आई हुई इंसुलिन का बड़ा हिस्सा दौरे में निकलने से पहले रोक लेता है।
- पेट का अम्ल अणु की मुड़ी हुई शक्ल खोल देता है
- पाचन के एंज़ाइम ज़ंजीर को टुकड़ों में बाँट देते हैं
- श्लेष्मा की परत और आँत की दीवार बड़े अणु को रास्ता नहीं देतीं
- यकृत, अपने तक पहुँचे हिस्से का बड़ा भाग दौरे में निकलने से पहले रोक लेता है
चारों रुकावटें मिलें तो एक चौंकाने वाली तस्वीर बनती है: बिना सुरक्षा वाली इंसुलिन का खून तक पहुँचने वाला हिस्सा एक प्रतिशत से नीचे रह जाता है। मानी रखने वाले असर के लिए ज़रूरी पदार्थ की मात्रा भी इसीलिए इतनी बड़ी हो जाती है कि ढोई न जा सके।
यकृत का यह हिस्सा रोक लेना असल में दो चेहरों वाली घटना है। शरीर की अपनी इंसुलिन भी अग्न्याशय से निकलकर पहले यकृत जाती है और वहाँ की सघनता बाक़ी दौरे से ऊँची रहती है। मुँह से ली जाने वाली इंसुलिन का आकर्षण कुछ हद तक यही है कि वह इसी क़ुदरती क्रम के पास पहुँच जाती है। जो चीज़ रुकावट है वही इनाम भी है।
इंसुलिन इसीलिए पाचन को लाँघने वाले रास्तों से जाती है और चमड़ी के नीचे वाला रास्ता इनमें सबसे आम है। फेफड़े में खींचा जाने वाला महीन चूर्ण रूप भी है, और वह भोजनों के साथ चलने वाले एक तेज़ विकल्प के रूप में अपनी जगह बचाए हुए है। पुराने फेफड़े के रोग वालों और धूम्रपान करने वालों को वह रास नहीं आता।
मुँह से ली जाने वाली इंसुलिन की खोज एक सदी से ज़्यादा से चल रही है। आज के परीक्षण कैप्सूल को पेट से बचाने पर, एंज़ाइम को कुछ समय के लिए धीमा करने पर और आँत की दीवार को थोड़ी देर के लिए ज़्यादा पारगम्य बनाने पर टिके हैं। एक उम्मीदवार तीसरे चरण के अध्ययन में उम्मीद पर खरा नहीं उतरा। एक दूसरा असर दिखा गया, पर सुई से जाने वाली मात्रा के दसियों गुना की माँग करने से वह ढोए जाने लायक़ नहीं निकला।
कठिनाई सिर्फ़ सोखा जाना नहीं है। मुँह से ली जाने वाली इंसुलिन को पृष्ठभूमि की ज़रूरत भी पूरी करनी है और भोजन की बढ़त भी, खाने से ज़्यादा प्रभावित नहीं होना है और बरसों तक सुरक्षित बने रहना है। एक गोली निगलने के लिए एक गिलास पानी काफ़ी है। वही आसानी बताती है कि यह खोज ख़त्म क्यों नहीं होती।
इंसुलिन को कैसे रखा जाता है?इंसुलिन एक प्रोटीन है, इसलिए उसे रखने की शर्त कोई ब्योरा नहीं बल्कि असर ख़ुद है। गरमी भी और जमना भी अणु की तीन-आयामी शक्ल बिगाड़ देते हैं, और बिगड़ी शक्ल वापस अपनी हालत में नहीं लौटती। बिना खुले डिब्बे और इस्तेमाल में चल रही इंसुलिन से रखी जाने वाली उम्मीद भी एक जैसी नहीं है। · 2 मिनटआगे पढ़ें
इंसुलिन की यह नाज़ुकी उसकी बनावट से आती है। उसके अणु शीशी में गुच्छों में रहते हैं। गरमी और हिलना गुच्छे को ढीला कर देते हैं। खुल आए अणु आपस में चिपककर रेशे जैसे ढेर बना लेते हैं। इन ढेरों का नाम फ़ाइब्रिल है और एक बार बन जाने पर वे वापस नहीं घुलते। फ़ाइब्रिल में बदला हिस्सा चमड़ी के नीचे से सोखा नहीं जाता; वह बर्तन में जगह घेरता है पर कोई काम नहीं करता।
गरमी इसके अलावा एक ख़ामोश रासायनिक क्षय भी शुरू कर देती है। अणु के कुछ बंधन समय के साथ बदल जाते हैं। असर धीरे-धीरे गल जाता है। यह नुक़सान आँख से नहीं दिखता। तापमान चढ़ने के साथ यह तेज़ भी होता जाता है।
जमने की तरफ़ जो होता है वह ज़्यादा सख़्त है: बर्फ़ के रवे प्रोटीन की बनावट को यांत्रिक रूप से तोड़ देते हैं और पिघलना इसे वापस नहीं लाता। दोबारा साफ़ हो गया तरल भी कोई गारंटी नहीं देता; दिखावट सुधर जाती है, बनावट नहीं सुधरती। फ़्रिज के दरवाज़े का रैक वह जगह है जहाँ तापमान सबसे ज़्यादा हिलता है, और पिछली दीवार के पास वाला हिस्सा जमने की रेखा के सबसे क़रीब का बिंदु है।
बिना खुले डिब्बे और चालू डिब्बे की उम्मीद अलग है। बिना खुला डिब्बा ठंड में लंबे समय ठहर सकता है, जबकि इस्तेमाल में आ चुके डिब्बे की कमरे की हालत में उम्र सीमित है। बर्तन पर लिखी आख़िरी तारीख़ भी बंद बर्तन के लिए है; बर्तन इस्तेमाल में आने के बाद की अवधि अलग है और वह कहीं छोटी है। अंक हर उत्पाद के अपने इस्तेमाल-पत्र में लिखे रहते हैं।
गरमी सहने की ताक़त समझे जाने से कुछ ज़्यादा चौड़ी है। एक कोक्रेन समीक्षा और उष्ण कटिबंध की हालत की नक़ल करने वाले प्रयोगशाला माप दिखाते हैं कि मानव इंसुलिनें बिना ठंडे माहौल में भी अपनी ताक़त बड़े हिस्से में बचा ले जाती हैं। फिर भी यह कोई छूट का प्रमाणपत्र नहीं है; यह सहन-शक्ति अवधि पर, उत्पाद पर और सीमा पर टिकी है।
दिखावट में आया बदलाव आँख से पकड़ी जा सकने वाली एक चेतावनी है।
- साफ़ रहने वाले तरल में धुँधलापन या रंग का बदल जाना
- तैरते हुए कण, गुठलियाँ या न घुलने वाले टुकड़े
- बर्तन की भीतरी सतह पर बर्फ़ जैसी दिखने वाली एक मटमैली परत
- धुँधले उत्पाद में, हिलाने के बाद भी न बिखरने वाली गुठली या बर्तन की तली से न उठने वाली तलछट
ये सारे निशान बर्तन के भीतर की तरफ़ देखते हैं। लंबे असर वाली कुछ इंसुलिनें चमड़ी के नीचे जो पतला जमाव छोड़ती हैं वह बिलकुल दूसरी चीज़ है; वह बनावट का हिस्सा है और शीशी में नहीं, शरीर में बनता है।
सफ़र दोनों सिरे एक साथ सामने ले आता है। हवाई जहाज़ का सामान वाला हिस्सा जमने की तरफ़ है, और गाड़ी का डैशबोर्ड ख़ाना तथा सीधी धूप पाता काँच का किनारा गरमी की तरफ़। ठंडे डिब्बे में जाने वाले किसी बर्तन का बर्फ़ से सीधा छूना भी अपने आप में जमने का जोखिम है। वही ढोने वाला बर्तन दिन के भीतर दोनों सिरों के पास चला जाता है।
रखने का तर्क एक वाक्य में समा जाता है: प्रोटीन को सिरे पसंद नहीं। सिरे कहाँ से शुरू होते हैं, यह बर्तन दर बर्तन बदलता है और इसे सिर्फ़ उत्पाद का अपना पत्र बताता है। अलमारी के रैक पर बैठा डिब्बा और ठंड में बैठा डिब्बा एक ही अवधि से बँधे नहीं हैं।
इंसुलिन पेन क्या होता है?पेन वह औज़ार है जो इंसुलिन को ढोने और नापने, दोनों को एक ही शरीर में जोड़ देता है; वर्णन बस इतना है। दिलचस्प यह है कि उसके हिस्से इस तरह क्यों बनाए गए। नोक का हर बार नया होना, शरीर का एक ही व्यक्ति के पास रहना और पेन के दो परिवार होना, ये अलग-अलग फ़ैसले नहीं हैं। · 2 मिनटआगे पढ़ें
पेन से पहले दो अलग हिस्से थे: वह काँच की शीशी जिसमें दवा रहती थी, और हर बार अलग से तैयार की जाने वाली सिरिंज। पेन ने इन्हें एक ही शरीर में जमा किया और नापने का काम भी शरीर के भीतर ले लिया। व्यक्ति अब आँख से खींचने के बजाय एक छल्ला घुमाता है, और छल्ला हर पायदान पर टिक करता है। बनावट का शुरुआती बिंदु यही था: नापना आँख से लेकर हाथ को दे देना।
शरीर के भीतर कार्ट्रिज रहता है; वह पतला काँच का बेलन जिसमें दवा इंतज़ार करती है। बाहर मात्रा तय करने वाला छल्ला है, जो घूमते-घूमते पायदान दर पायदान टिक करता है। वह टिक सजावट नहीं है: जिसे आँख ठीक से नहीं दिखती, उसके लिए वह एक अलग जवाब देने वाला रास्ता है। किसी पेन में छल्ला ज़्यादा बारीक क़दमों में चलता है, किसी में ज़्यादा मोटे। यह फ़र्क़ उँगलियों के सिरे सुन लेते हैं। नोक पेन नहीं ढोता; वह बाद में लगती है और अपने पैकेट में अलग बिकती है।
सुई की नोक के एक बार इस्तेमाल के लिए होने की वजह नंगी आँख से नहीं दिखती। बड़ा करके देखने पर एक बार इस्तेमाल हो चुकी नोक का किनारा कुंद और खरोंचा हुआ निकलता है। वही नोक दोबारा इस्तेमाल करने वालों में ज़्यादा दर्द बताया जाता है; कुंद हुआ किनारा इसका जाना-पहचाना कारण है। चमड़ी के नीचे की सख़्ती एक और विषय है। वहाँ असली हिस्सा नोक का नहीं, ख़ुद इंसुलिन का है; इसे उठाने वाला एक अलग लेख है। नोक पेन में लगी भूल जाई जाए तो कार्ट्रिज में हवा रिस जाती है, और छल्ले की दिखाई मात्रा तथा बाहर निकली मात्रा अलग हो जाती हैं।
यही वजह ख़ुद शरीर के लिए भी लागू है। नोक बदल जाए तब भी इंजेक्शन के दौरान कार्ट्रिज में वापस जा सकने वाला सूक्ष्म ऊतक पेन को व्यक्ति-विशेष उपकरण बना देता है। इसीलिए एक पेन दो लोगों के बीच नहीं घूमता।
पेन दो परिवारों में बँटते हैं; फ़र्क़ का इकलौता पैमाना यह है कि कार्ट्रिज शरीर में गड़ा हुआ है या नहीं।
| गुण | इस्तेमाल-करके-फेंकने वाला पेन | दोबारा भरा जाने वाला पेन |
|---|---|---|
| कार्ट्रिज | शरीर में गड़ा, निकलता नहीं | ख़ाली होने पर नए से बदलता है |
| शरीर | दवा ख़त्म होने पर फेंक दिया जाता है | बरसों वही रहता है |
| सुई की नोक | अलग बिकती है, एक बार के लिए | अलग बिकती है, एक बार के लिए |
| शरीर का माल | आम तौर पर प्लास्टिक, हलका | आम तौर पर धातु, कुछ भारी |
| पीछे बचा कचरा | हर बार एक शरीर | सिर्फ़ कार्ट्रिज और नोक |
पेन कोई पंप नहीं है। वह अपने आप फ़ैसला नहीं करता और ब्लड शुगर भी नहीं नापता। एक नई पीढ़ी इससे एक क़दम आगे जाती है: जुड़े हुए पेन आख़िरी दी गई मात्रा और उसका समय दर्ज करके फ़ोन तक पहुँचा देते हैं। इसके लिए शरीर में बैटरी और जोड़ने का परिपथ आता है, यानी पेन अब सिर्फ़ दवा नहीं, दवा का रिकॉर्ड भी ढोता है। इस तरह पिछले इंजेक्शन को कितना समय बीता, यह शरीर ख़ुद याद रखता है।
एडीए बहुत सारे इंजेक्शन माँगने वाले इलाजों में पेन को सिरिंज के मुक़ाबले आगे रखता है। जिनके हाथ की कुशलता घट गई हो या देखने में दिक़्क़त हो, उनमें यह पसंद और साफ़ हो जाती है। यानी पेन इलाज ख़ुद नहीं, इलाज को साथ ले जाने लायक़ बनाने वाला औज़ार है। कौन-सा पेन किसके लिए ठीक है, यह हाथ, आँख और रोज़ की तरतीब के हिसाब से बदलता है।
यह लेख सिर्फ़ जानकारी के लिए है; यह न रोग की पहचान है, न इलाज या मात्रा का निर्देश। आपके इलाज का फ़ैसला हमेशा वह होता है जो आप अपने डॉक्टर के साथ मिलकर लेते हैं।