गाड़ी चलाते समय शुगर गिरे तो क्या बिगड़ता है?
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स्टीयरिंग के पीछे का काम दिमाग़ के सबसे महँगे कामों को एक साथ और बिना रुके चलाता है। ध्यान, आँख का सड़क टटोलना और एक सेकंड का फ़ैसला उसी बहाव के हिस्से हैं। ब्लड शुगर उतरे तो तीनों साथ कमज़ोर पड़ते हैं; सिम्युलेटर में चलाना बिगड़ता है, चालक भाँपता है, सुधार फिर भी देर से आता है।
सड़क पर बीतने वाला हर मिनट दिमाग़ से बिना रुके एक काम माँगता है। लेन पर टिके रहना, शीशों को टटोलना और दूरी का अंदाज़ा लगाना एक साथ चलते हैं। दिमाग़ ग्लूकोज़ जमा नहीं करता। बहाव पतला हो तो सबसे महँगे काम पहले बिगड़ते हैं। और सड़क के कामों की पूरी सूची उसी महँगी तरफ़ है। बिगाड़ ध्यान और फ़ैसले की रफ़्तार में भी दिखता है और हाथ के काम में भी; दोनों मिलकर एक ही संज्ञानात्मक-गत्यात्मक गिरावट के रूप में नापे जाते हैं। जो स्तर चुपचाप बैठे रहते समय छोटा दिखता है, वह स्टीयरिंग वाले व्यक्ति में एक नापे जा सकने वाले फ़र्क़ में बदल जाता है।
इस बिगाड़ को सीधे नापने वाला एक सिम्युलेटर प्रयोग है। टाइप 1 मधुमेह वाले बड़े लोग उसी बनावट पर चले, पहले सामान्य चाल में और फिर सीढ़ी दर सीढ़ी उतारे गए ब्लड शुगर के साथ। गाड़ी चलाना तीनों नीची सीढ़ियों पर बिगड़ा; सबसे हलकी सीढ़ी पर भी बिगाड़ नापा गया। हिस्सा लेने वाले बिगाड़ को भाँप रहे थे। यह भाँपना ख़ुद गिरावट के महसूस होने के साथ और दिमाग़ की तरफ़ के लक्षणों के साथ चला; जबकि गाड़ी चलाने का बिगाड़ ख़ुद कँपकँपी और पसीने जैसे शारीरिक लक्षणों से जुड़ा निकला। इसके बावजूद सुधारने वाला बर्ताव सिर्फ़ सबसे नीची सीढ़ी पर उभरा। साथ-साथ चली दिमाग़ की तरंगों की रिकॉर्डिंग भी उसी ओर देखती है: दिमाग़ में ग्लूकोज़ की कमी के साथ बढ़ने वाली धीमी तरंग, सुधारने वाले बर्ताव का रास्ता रोक रही थी।
दूसरा आँकड़ा मैदान से आता है। चार सौ से ज़्यादा चालकों ने एक साल तक महीने-दर-महीने रिपोर्ट भरी। जिन घटनाओं की सूचना दी गई उनमें गाड़ी पर नियंत्रण खोना, रास्ते का एक हिस्सा बाद में याद न कर पाना और स्टीयरिंग बगल वाले व्यक्ति को सौंप देना शामिल थे। आधे से ज़्यादा चालकों ने साल भर में कम से कम एक बार गिरावट से जुड़ी कोई गाड़ी वाली घटना बताई। बारंबारता सड़क पर तय की गई दूरी के साथ और पहले हो चुकी किसी भारी गिरावट के साथ बढ़ती थी।
“शुगर गिर जाए तो क्या करें?” शीर्षक में वह रास्ता है जो गिरावट भाँपे जाने के बाद लिया जाता है। इन घटनाओं की साझा ज़मीन तो दिमाग़ में ग्लूकोज़ की कमी है, यानी दिमाग़ के ईंधन से ख़ाली होने के साथ आने वाली दूसरी लहर। इस लहर में सोचने की रफ़्तार, चुनाव करना और ध्यान में बने रहना एक साथ भारी हो जाते हैं। शरीर की चेतावनियाँ उससे पहले आती हैं। दोहराई जाने वाली गिरावटें उस चेतावनी को बरसों में छोटा कर सकती हैं।
तीसरा नतीजा इस बारे में है कि क़तार के अंत में क्या होता है। जिन बड़ों का ब्लड शुगर नियंत्रित ढंग से उतारकर फिर चढ़ाया गया, उनमें संज्ञान की जाँचें डेढ़ घंटे तक चलती रहीं। पीछे रह जाने वाला माप वह जाँच थी जो कई विकल्पों में से तेज़ चुनाव करने को परखती है; अंक अपनी जगह बैठ जाने के बाद भी वह चालीस मिनट तक नीचा बना रहा। क्रम का पीछा करने को नापने वाली निशान-खोज जाँच कहीं जल्दी सँभल गई। इन मापों में अंक के सँभलने का पल और चुनाव की रफ़्तार के सँभलने का पल एक-दूसरे पर नहीं गिरे।
स्रोत
- Cox DJ, Gonder-Frederick LA, Kovatchev BP, Julian DM, Clarke WL. Progressive hypoglycemia’s impact on driving simulation performance. Occurrence, awareness and correction. Diabetes Care. 2000;23(2):163-170. doi:10.2337/diacare.23.2.163
- Cox DJ, Ford D, Gonder-Frederick L, Clarke W, Mazze R, Weinger K, Ritterband L. Driving mishaps among individuals with type 1 diabetes: a prospective study. Diabetes Care. 2009;32(12):2177-2180. doi:10.2337/dc08-1510
- Zammitt NN, Warren RE, Deary IJ, Frier BM. Delayed recovery of cognitive function following hypoglycemia in adults with type 1 diabetes: effect of impaired awareness of hypoglycemia. Diabetes. 2008;57(3):732-736. doi:10.2337/db07-0695