क्या शुगर घटाने वाली जड़ी-बूटियाँ काम करती हैं?
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शुगर घटाने वाली कही जाने वाली जड़ी-बूटियों के लिए हाथ में कोई साफ़ जवाब नहीं है, क्योंकि अध्ययन एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। दालचीनी, क्रोमियम, मेथी और बर्बेरिन की समीक्षाओं में कोई छोटा सुधार बताती है और कोई कोई फ़र्क़ ही नहीं पाती। असली मामला तो कहीं और खड़ा है।
प्रमाण की तस्वीर बिखरी हुई है। दालचीनी के लिए समीक्षाएँ आपस में मेल नहीं खातीं। दस के क़रीब अध्ययनों को जोड़ने वाली एक पुरानी व्यवस्थित समीक्षा शक्कर के पैमानों में मानी रखने वाला फ़र्क़ नहीं पा सकी; जबकि नई और ज़्यादा अध्ययन जोड़ने वाली एक समीक्षा ने एक छोटा सुधार बताया। क्रोमियम के लिए नतीजे अध्ययन दर अध्ययन उछलते रहे। बर्बेरिन और मेथी के लिए असर बताने वाली समीक्षाएँ हैं, पर वे कम हिस्सा लेने वालों और कुछ हफ़्तों तक सीमित हैं। दिक़्क़त हर बार उसी जगह जमा होती है: छोटे समूह, छोटी अवधि, और एक-दूसरे से न मिलते-जुलते उत्पाद।
इसकी एक वजह यह भी है: जड़ी-बूटी का नाम कोई मानक नहीं है। किसी परीक्षण में इस्तेमाल हुआ सत्त एक तय पौधे के तय हिस्से से एक तय विधि से निकाला जाता है; जबकि दुकान के रैक का चूर्ण किसी और प्रक्रिया की उपज है। कटाई का समय, सुखाना और पीसना भी उसके भीतर की चीज़ हिला देते हैं। इसीलिए किसी परीक्षण का सकारात्मक नतीजा उसी नाम वाले किसी दूसरे डिब्बे को नहीं सौंपा जाता। नाम देखकर वही नतीजा माँगना यहाँ धोखा देता है।
- आपसी असर: शुगर घटाने वाली दवा के साथ ली गई कुछ जड़ी-बूटियाँ कुल असर बड़ा कर देती हैं; इस रिश्ते का ब्योरा दवाओं के आपसी असर वाला अलग लेख खोलता है। गिरावट अपने को पसीने, कँपकँपी, धड़कन, अचानक भूख और ध्यान के बिखरने से ज़ाहिर करती है। यह तस्वीर कोई नया उत्पाद जुड़ने के बाद ज़्यादा बार आने लगी हो तो उसकी वजह वही उत्पाद हो सकता है।
- निगरानी: पूरक ज़्यादातर जगहों पर दवा की तरह जाँचे नहीं जाते; रैक पर आने से पहले उनसे असर और सुरक्षा का प्रमाण नहीं माँगा जाता, और सामग्री तथा शुद्धता लॉट दर लॉट हिलती है। शुगर घटाने वाली कहकर बेची जाने वाली वनस्पति उत्पादों को जमा करने वाली एक जाँच ने ज़्यादातर डिब्बों में लेबल पर न लिखा दवा का असरदार तत्व पाया। सबसे ज़्यादा निकलने वाला सल्फ़ोनिलयूरिया वर्ग का था, और उसके बगल में एक पुरानी शुगर की दवा थी जिसे सुरक्षा की वजह से बाज़ार से हटाया जा चुका था। इन उत्पादों को इस्तेमाल करने वालों में से दो-तिहाई को नुक़सान हुआ, और उसका सबसे आम रूप शुगर का गिरना था।
- टालना: जिस उत्पाद को काम का समझा जाता है, वह असली इलाज की जगह ले सकता है। उस दौर में कोई माप नहीं होता इसलिए चढ़े हुए मान रिकॉर्ड में नहीं आते; हालत अगली जाँच में ही दिखती है।
जिस विटामिन या खनिज की कमी दिखाई जा चुकी है उसे भरना बिलकुल अलग विषय है। सबसे जाना-पहचाना उदाहरण मेटफ़ॉर्मिन है: लंबे इस्तेमाल में उसे बी12 के स्तर के गिरने से जोड़ा जाता है और दिशानिर्देश इस समूह में उस स्तर को समय-समय पर नापने की बात उठाते हैं। किसी तय की गई कमी को भरना, शक्कर घटाने की उम्मीद में रैक के आगे खड़े होकर उत्पाद चुनने जैसा काम नहीं है।
प्रमाण और निगरानी यहाँ एक ही दिशा में अधूरे हैं। किसी दवा से जो प्रमाण माँगा जाता है, वही दावा ढोने वाले वनस्पति उत्पाद से नहीं माँगा जाता; डिब्बे पर लिखा वाक्य किसी अध्ययन से नहीं, किसी विपणन के फ़ैसले से आता है। डिब्बा हाथ में लेने वाले को दिखने वाला इकलौता पैमाना भी वही वाक्य है।
स्रोत
- Leach MJ, Kumar S. Cinnamon for diabetes mellitus. Cochrane Database Syst Rev. 2012;2012(9):CD007170.
- McKennon SA. Non-Pharmaceutical Intervention Options For Type 2 Diabetes: Complementary and Integrative Health Approaches. In: Endotext. MDText.com; 2024. Bookshelf ID NBK279062.
- Ching CK, Lam YH, Chan AYW, Mak TWL. Adulteration of herbal antidiabetic products with undeclared pharmaceuticals: a case series in Hong Kong. Br J Clin Pharmacol. 2012;73(5):795-800.
- American Diabetes Association Professional Practice Committee. 9. Pharmacologic Approaches to Glycemic Treatment: Standards of Care in Diabetes-2026. Diabetes Care. 2026;49(Suppl 1):S183-S215. PMCID: PMC12690185.