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रेशा ब्लड शुगर पर कैसे असर करता है?

· 2 मिनट

गहरे भूरे जूट के टाट की घनी बुनाई, बहुत पास से; बाना और ताना के धागे एक-एक करके पहचाने जाते हैं।

रेशा कार्बोहाइड्रेट की वह क़िस्म है जिसे पाचन के एंज़ाइम तोड़ नहीं पाते, और वह खून में ग्लूकोज़ बनकर नहीं जाता। ब्लड शुगर पर उसका असर घुमावदार है: घुलने वाली क़िस्म पेट के ख़ाली होने को धीमा करती है और भोजन के बाद की बढ़त चौड़े समय पर फैल जाती है। चोटी नीची होती है, बढ़त मिटती नहीं।

रेशा पौधों की कोशिका-दीवारों से आता है। वह अनाज के चोकर में, दाल के छिलके में, फल के गूदे में और सब्ज़ी के रेशों में रहता है। रसायन के हिसाब से वह भी एक कार्बोहाइड्रेट है, क्योंकि वह उन्हीं शक्कर के छल्लों से बना है। पर इंसान में इन छल्लों को खोलने वाला एंज़ाइम नहीं है। इसीलिए रेशा जिस रास्ते भीतर जाता है, लगभग वैसा ही बाहर निकलता है।

रेशे के दो परिवार हैं और ये दोनों आँत में अलग-अलग काम करते हैं। घुलने वाला रेशा पेट और आँत के पानी से मिलकर गाढ़ा, चिपचिपा जेल बना लेता है। न घुलने वाला रेशा पानी में नहीं बिखरता; वह घनफल देता है और आँत की सामग्री को आगे धकेलता है।

रेशे की क़िस्मकहाँ मिलता हैआँत में क्या करता है
घुलने वालाजई, जौ, दलहन, सेब, नींबू वर्गपानी पकड़कर जेल बनाता है, पेट का निकास देर करता है
न घुलने वालासाबुत अनाज का चोकर, सब्ज़ी के डंठल, मेवों का छिलकाघनफल देता है, गुज़रने का समय छोटा करता है

असली तंत्र जेल में छिपा है। पेट अपनी सामग्री छोटी आँत में उतारता है, और यह जेल उस बहाव में देर करा देता है। कार्बोहाइड्रेट आँत तक धीरे पहुँचे तो ग्लूकोज़ खून में एक ही बार नहीं, लहर-दर-लहर जाता है। भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा नहीं बदलती; बदलती सिर्फ़ यह है कि वह मात्रा समय पर कैसे फैलती है। चोटी ज़्यादा नीची और वक्र ज़्यादा चौड़ा हो जाता है।

न घुलने वाले रेशे का काम ज़्यादा यांत्रिक है। वह आँत की सामग्री में घनफल जोड़ता है और गुज़रने को तरतीब देता है। ये दोनों क़िस्में ज़्यादातर खानों में साथ आती हैं, अलग-अलग नहीं। मसूर के एक कटोरे में या साबुत अनाज की रोटी के एक टुकड़े में दोनों मौजूद हैं। घुलने वाले रेशे का बनाया जेल पेट को ज़्यादा देर भरा रखता है; भरे होने के एहसास को इसी से जोड़ा जाता है।

साबुत अनाज और सफ़ेद आटे के बीच के फ़र्क़ का एक हिस्सा यहीं से आता है। पिसाई के दौरान दाने का चोकर और भ्रूण अलग हो जाते हैं, और पीछे स्टार्च वाला आटा बच जाता है। चोकर गया तो जेल बनाने वाला माल भी गया। कितना पिसा है यह भी अलग मामला है: साबुत दाना और बारीक आटा एक ही थाली में आएँ तब भी आँत में दो अलग रफ़्तार से चलते हैं।

रेशे की सीमा भी साफ़ है। किसी खाने में रेशा जोड़ देना उसके भीतर के स्टार्च या शक्कर को मिटा नहीं देता। जिस उत्पाद के डिब्बे पर रेशे की पंक्ति ऊँची दिखती है, वह इसीलिए अपने आप हलका नहीं गिना जाता। रेशा बढ़ाए जाने वाले परीक्षणों को जोड़ने वाली एक समीक्षा में HbA1c जैसे लंबी अवधि के पैमाने ज़्यादा अनुकूल निकले; फ़र्क़ बनाने वाली चीज़ कोई एक खाना नहीं, कुल नमूना है। रेशा तेज़ी से बढ़ाने का जाना-पहचाना असर गैस और पेट फूलना है, क्योंकि बड़ी आँत के जीवाणु इस माल को किण्वित करते हैं।

स्रोत

  1. Daley SF, Shreenath AP. The Role of Dietary Fiber in Health Promotion and Disease Prevention: A Practical Guide for Clinicians. [Updated 2025 Dec 1]. In: StatPearls [Internet]. Treasure Island (FL): StatPearls Publishing; 2026.
  2. Reynolds AN, Akerman AP, Mann J. Dietary fibre and whole grains in diabetes management: Systematic review and meta-analyses. PLoS Med. 2020;17(3):e1003053. doi:10.1371/journal.pmed.1003053
  3. Holesh JE, Aslam S, Martin A. Physiology, Carbohydrates. [Updated 2023 May 12]. In: StatPearls [Internet]. Treasure Island (FL): StatPearls Publishing; 2026.
  4. American Diabetes Association Professional Practice Committee. 5. Facilitating Positive Health Behaviors and Well-being to Improve Health Outcomes: Standards of Care in Diabetes-2026. Diabetes Care. 2026;49(Suppl 1):S89-S131. doi:10.2337/dc26-S005

यह लेख सिर्फ़ जानकारी के लिए है; यह न रोग की पहचान है, न इलाज या मात्रा का निर्देश। आपके इलाज का फ़ैसला हमेशा वह होता है जो आप अपने डॉक्टर के साथ मिलकर लेते हैं।

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